इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह शीर्षक थोड़ा विरोधाभासी है, क्योंकि “आर्यभट्ट” प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ-खगोलशास्त्री हैं और “1682” एक आधुनिक काल की तिथि है। संभवतः, यह “आर्यभट्ट विज्ञान पत्रिका” नामक किसी पत्रिका का अप्रैल (या कोई अन्य महीना) का अंक है, और ‘1682’ या तो एक मुद्रण त्रुटि है या किसी विशेष संवत् या अंक संख्या को संदर्भित करता है। यह पत्रिका विज्ञान के विभिन्न विषयों, विशेष रूप से भारत के वैज्ञानिक योगदान, पर केंद्रित हो सकती है। इस अंक में खगोल विज्ञान, गणित, या प्राचीन भारतीय विज्ञान की विरासत जैसे विषयों पर लेख, शोध-पत्र और जानकारीपूर्ण सामग्री प्रकाशित हुई होगी, जिसका उद्देश्य विज्ञान को लोकप्रिय बनाना है।
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