इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह एक लोक-कथा या बोध-कथा है जो एक चालाक मालिक और नज़र बहादुर नामक एक चतुर मजदूर के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। मालिक शायद मजदूर से बहुत ज्यादा काम कराना चाहता है और उसे कम मजदूरी देना चाहता है। लेकिन नज़र बहादुर अपनी बुद्धि और हाजिर-जवाबी से हर बार मालिक की चालों को विफल कर देता है और अपना पूरा हक हासिल करता है। यह कहानी “जैसे को तैसा” के सिद्धांत पर आधारित हो सकती है। यह शोषण के खिलाफ बुद्धि की जीत को दर्शाती है और यह संदेश देती है कि कमजोर व्यक्ति भी अपनी चतुराई से शक्तिशाली का मुकाबला कर सकता है।
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