इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
हमारा और भी कहना है कि यदि मनुष्य का प्रेत भी काय्ये करे ता वह जीवित है और वही सब कुछ है परन्तु जीवित पुरुष भी सतवत् है यदि वह अपने कम्म के नहीं जानता । हमने आज तक जितने मनुष्यों का उन्नति शील देखा है वे सारे कम्म ही के आधार से बने ८ हम आदि से अन्त तक कम्मे ही की जय पाते हैं। कहां तक कहें यदि हवा भी अपने रात दिन चलने के कम्म के छाड़ दे ता वह विपमयी हा जाती है, यदि वह एक दिन भी रूक जाय ता दुनिया लयता का प्राप्त हा जाय इसी प्रकार बहती हुए नदी के भी मानिये कि यदि वह भा अपनी चाल को रोक ले ता शीघ्र समाप्रि का प्राप्ति हा ।
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