इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“श्री तत्त्व निधि” मैसूर के महाराजा कृष्णराज वोडेयार तृतीय द्वारा संकलित एक विशाल और विश्वकोशीय ग्रंथ है। यह नौ निधियों (खंडों) में विभाजित है, और प्रस्तुत पुस्तक इसकी चौथी निधि, “ब्रह्मनिधि”, है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह निधि ‘ब्रह्म’ और अध्यात्म-विद्या पर केंद्रित है। इसमें वेदांत दर्शन के विभिन्न सिद्धांतों, विशेष रूप से अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत, का सार-संग्रह हो सकता है। इसमें उपनिषदों, गीता और ब्रह्मसूत्र के प्रमुख विचारों को भी संकलित किया गया होगा। यह ग्रंथ भारतीय दर्शन के विभिन्न संप्रदायों के मूल तत्वों को एक ही स्थान पर प्रस्तुत करने का एक अनूठा प्रयास है, जो अध्येताओं के लिए अत्यंत मूल्यवान है।
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