इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“शिवाद्वैतमंजरी” का अर्थ है “शिव-अद्वैत की मंजरी (पुष्प-गुच्छ)”। यह अद्वैत वेदांत की उस शाखा पर एक ग्रंथ है जो शैव दृष्टिकोण से अद्वैत का प्रतिपादन करती है, जिसे ‘शैवागम’ या ‘काश्मीर शैव दर्शन’ के साथ भी जोड़ा जा सकता है। इसमें यह तर्क दिया गया होगा कि परम सत्य ‘शिव’ ही हैं, जो एकमात्र, अद्वितीय और चैतन्य स्वरूप हैं, और यह संपूर्ण जगत उन्हीं की शक्ति का प्रकटीकरण है। इसमें जीव और शिव की एकता के सिद्धांत को स्थापित किया गया होगा और उस एकता को अनुभव करने के साधनात्मक मार्गों पर प्रकाश डाला गया होगा। यह वेदांत और शैव दर्शन के समन्वय को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण कृति है।
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