इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित यह पुस्तक हिन्दू धर्म में प्रचलित ‘अवतारवाद’ की अवधारणा पर एक आलोचनात्मक ‘मीमांसा’ (गहन विश्लेषण) है। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द ने वेदों को ही परम प्रमाण मानते हुए पौराणिक अवतारवाद का खंडन किया है। इस कृति में उन्होंने तर्कों और वैदिक प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि ईश्वर अजन्मा और निराकार है, और वह मनुष्य के रूप में अवतार नहीं लेता। यह आर्य समाज के एकेश्वरवादी दृष्टिकोण को समझने के लिए एक मौलिक ग्रंथ है।
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