इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह आचार्य विद्यानंद द्वारा रचित एक विशाल और गहन जैन दार्शनिक ग्रंथ का चौथा भाग है। यह ग्रंथ आचार्य उमास्वामी के ‘तत्त्वार्थसूत्र’ पर आचार्य अकलंक के ‘तत्त्वार्थवार्तिक’ की भी विस्तृत व्याख्या करता है, इसलिए इसे ‘अलंकार’ कहा गया है। यह जैन न्याय और दर्शन का एक शिखर ग्रंथ है, जिसमें अन्य भारतीय दर्शनों की मान्यताओं का खंडन-मंडन करते हुए जैन सिद्धांतों को स्थापित किया गया है। यह केवल प्रकांड विद्वानों के अध्ययन का विषय है।
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