इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“श्रीमद्भगवद्गीताभाष्यम्” का अर्थ है श्रीमद्भगवद् गीता पर लिखा गया भाष्य या टीका। यह शीर्षक किसी विशिष्ट भाष्यकार का नाम नहीं बताता, लेकिन यह संभवतः आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, या किसी अन्य प्रमुख आचार्य द्वारा रचित गीता के क्लासिक भाष्यों में से एक को संदर्भित करता है। एक भाष्यकार गीता के प्रत्येक श्लोक की गहन दार्शनिक व्याख्या करता है, अपने दार्शनिक संप्रदाय (जैसे- अद्वैत, विशिष्टाद्वैत) के दृष्टिकोण से उसके अर्थ को स्पष्ट करता है, और अन्य मतों का खंडन करता है। यह कृति गीता के केवल शाब्दिक अर्थ से परे जाकर उसके गूढ़ आध्यात्मिक और दार्शनिक रहस्यों को समझने के लिए गंभीर अध्येताओं के लिए एक अनिवार्य ग्रंथ है।
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