इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह पुस्तक वेदों में वर्णित ‘ब्रह्म’ की अवधारणा पर एक गहन दार्शनिक विवेचना प्रस्तुत करती है। इसमें लेखक ने ऋग्वेद से लेकर उपनिषदों तक ‘ब्रह्म’ तत्व के विकास और उसकी विभिन्न व्याख्याओं का विश्लेषण किया होगा। यह कृति इस प्रश्न की पड़ताल करती है कि वेदों के अनुसार ब्रह्म का स्वरूप क्या है – क्या वह सगुण है या निर्गुण, साकार है या निराकार? इसमें यज्ञ, देवता और सृष्टि की रचना के संदर्भ में ब्रह्म की भूमिका पर भी विचार किया गया होगा। यह पुस्तक वैदिक साहित्य के अध्येताओं और भारतीय दर्शन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए है, जो वेदों के केंद्रीय आध्यात्मिक सिद्धांत को उसकी समग्रता में समझना चाहते हैं।
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