इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह एक उच्च स्तरीय दार्शनिक कृति है जो वेदांत दर्शन की दो प्रमुख शाखाओं – आदि शंकराचार्य के ‘अद्वैतवाद’ और निम्बार्काचार्य के ‘द्वैताद्वैतवाद’ – की तत्वमीमांसा (metaphysics) का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है। अद्वैतवाद ब्रह्म को एकमात्र सत्य मानता है, जबकि द्वैताद्वैतवाद ब्रह्म, जीव और जगत के बीच भेद और अभेद दोनों को एक साथ सत्य मानता है। यह पुस्तक इन दोनों दर्शनों के ब्रह्म, आत्मा और जगत के स्वरूप तथा उनके पारस्परिक संबंधों पर विचारों का गहन विश्लेषण करती है। यह उनकी समानताओं, भिन्नताओं और उनके तर्कों की आलोचनात्मक समीक्षा करती है, जो वेदांत दर्शन के विद्वानों और शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।
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