इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“अद्वैतमार्तण्ड” का अर्थ है “अद्वैत का सूर्य”। यह अद्वैत वेदांत दर्शन पर एक महत्वपूर्ण और विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ है। ‘मार्तण्ड’ (सूर्य) की उपाधि यह दर्शाती है कि यह ग्रंथ अद्वैत के सिद्धांतों पर छाए हुए अज्ञान और विरोधी मतों के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। इसमें संभवतः आदि शंकराचार्य के बाद के किसी प्रमुख अद्वैतवादी आचार्य (जैसे- मधुसूदन सरस्वती) द्वारा अन्य दार्शनिक संप्रदायों (जैसे- द्वैत, विशिष्टाद्वैत) के तर्कों का जोरदार खंडन किया गया होगा और अद्वैत के ‘जीव-ब्रह्म की एकता’ के सिद्धांत को अकाट्य तर्कों से पुनः स्थापित किया गया होगा। यह वेदांत के उच्च अध्ययन के लिए एक गहन कृति है।
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