इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“भक्तिरसार्णव” का अर्थ है “भक्ति रस का महासागर”। यह वैष्णव भक्ति परंपरा का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो भक्ति को एक ‘रस’ (aesthetic emotion) के रूप में स्थापित और विश्लेषित करता है। काव्यशास्त्र के ‘रस सिद्धांत’ का भक्ति पर आरोपण करते हुए, इस ग्रंथ में भक्ति के विभिन्न भावों (जैसे- शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर) और उनके स्थायी भावों, विभावों, अनुभावों की गहन विवेचना की गई है। इसका उद्देश्य यह सिद्ध करना है कि भक्ति केवल एक साधना नहीं, बल्कि एक सर्वोच्च आनंदमयी अनुभूति है, जो सभी लौकिक रसों से श्रेष्ठ है। यह गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय जैसे भक्ति-केंद्रित दर्शनों के लिए एक प्रमुख शास्त्रीय ग्रंथ है।
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