इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह पुस्तक भारतीय दर्शन के ज्ञानमीमांसा (epistemology) के एक विशिष्ट सिद्धांत “प्राप्यकारित्ववाद” पर केंद्रित एक गहन दार्शनिक अध्ययन है। प्राप्यकारित्ववाद का सिद्धांत कहता है कि हमारी इंद्रियाँ विषय (object) तक पहुँचकर या उसके संपर्क में आकर ही ज्ञान प्राप्त करती हैं, जैसे कि आँख से निकलने वाली ‘रश्मि’ वस्तु तक जाकर उसे ग्रहण करती है। यह सिद्धांत विशेष रूप से न्याय-वैशेषिक दर्शन में प्रमुख है। इस कृति में इस सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या, इसके पक्ष में दिए गए तर्कों, और बौद्ध दर्शन जैसे अन्य مکاتب فکر द्वारा की गई इसकी आलोचनाओं का विश्लेषण किया गया होगा। यह भारतीय दर्शन के ज्ञान-सिद्धांतों में रुचि रखने वाले विद्वानों के लिए एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
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