इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह पुस्तक भाग्य (दैव) और कर्म (पुरुषार्थ) के बीच के सदियों पुराने दार्शनिक प्रश्न पर एक गहन विवेचना प्रस्तुत करती है। लेखक ने शास्त्रों और तर्कों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया है कि जीवन में सफलता के लिए इन दोनों का क्या महत्व है। क्या सब कुछ पहले से तय है, या मनुष्य अपने कर्मों से अपना भाग्य खुद बना सकता है? यह कृति पाठकों को निष्क्रिय होकर भाग्य के भरोसे बैठने की बजाय कर्म करने के लिए प्रेरित करती है, साथ ही यह भी स्वीकार करती है कि कुछ चीजें हमारे नियंत्रण से परे हो सकती हैं।
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