इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह कृति श्रीमद्भगवद्गीता के नौवें अध्याय, जिसे ‘राजविद्याराजगुह्ययोग’ कहा जाता है, पर एक विस्तृत भाष्य या विवेचन है। ‘राज विद्या’ का अर्थ है ‘विद्याओं का राजा’ और ‘राज गुह्य’ का अर्थ है ‘रहस्यों का राजा’। इस अध्याय में भगवान कृष्ण अपने भक्त को सबसे गोपनीय ज्ञान प्रदान करते हैं, जिसमें वे अपने सर्वव्यापी और 초월적인 स्वरूप का वर्णन करते हैं। यह पुस्तक इस अध्याय के गूढ़ अर्थों को खोलती है, और भक्ति के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने के सरल लेकिन सबसे प्रभावी मार्ग पर प्रकाश डालती है।
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