इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह पुस्तक ‘हिंदी साहित्य की जनवादी परंपरा’ पर एक आलोचनात्मक अध्ययन है। ‘जनवादी’ का अर्थ है ‘जनता का’ या ‘जनता के लिए’। लेखक इसमें हिंदी साहित्य की उस धारा की पड़ताल करता है जो हमेशा से आम जनता, शोषितों और हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज रही है – कबीर जैसे संतों से लेकर प्रगतिवादी लेखकों तक। यह साहित्य को अभिजात्य वर्ग के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि आम आदमी के संघर्षों की अभिव्यक्ति के रूप में देखती है।
फ़ॉर्मेट बदलना
क्या आपको यह फ़ाइल किसी दूसरे फ़ॉर्मेट में चाहिए? इसके लिए आप iLovePDF का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो एक बहुत अच्छा ऑनलाइन टूल है।
ई-रीडर पर भेजें
आप Amazon की “Send to Kindle” जैसी फ्री सर्विस का इस्तेमाल करके आसानी से फ़ाइल को अपने डिवाइस पर भेज सकते हैं।
कोई दिक्कत आ रही है?
चेक करें कि आपके ई-रीडर का सॉफ्टवेयर अपडेटेड है। यदि फ़ाइल खराब हो या न खुले, तो कृपया उसे पुनः डाउनलोड करें। फिर भी समस्या हो तो हमसे संपर्क करें।