इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
ईशावास्योपनिषत्, शुक्ल यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय, सबसे छोटे लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण उपनिषदों में से एक है। इसका आरंभ “ईशा वास्यमिदं सर्वं” मंत्र से होता है, जिसका अर्थ है ‘यह सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है’। यह उपनिषद् ज्ञान (आध्यात्मिक चिंतन) और कर्म (सांसारिक कर्तव्य) के बीच संतुलन बनाने का अद्भुत संदेश देता है। यह सिखाता है कि व्यक्ति को संसार में रहते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए, अनासक्त भाव से जीवन जीना चाहिए। महात्मा गांधी ने कहा था कि यदि सारे हिंदू धर्मग्रंथ नष्ट भी हो जाएं और केवल ईशावास्योपनिषत् का पहला श्लोक बचा रहे, तो भी हिंदू धर्म जीवित रहेगा।
फ़ॉर्मेट बदलना
क्या आपको यह फ़ाइल किसी दूसरे फ़ॉर्मेट में चाहिए? इसके लिए आप iLovePDF का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो एक बहुत अच्छा ऑनलाइन टूल है।
ई-रीडर पर भेजें
आप Amazon की “Send to Kindle” जैसी फ्री सर्विस का इस्तेमाल करके आसानी से फ़ाइल को अपने डिवाइस पर भेज सकते हैं।
कोई दिक्कत आ रही है?
चेक करें कि आपके ई-रीडर का सॉफ्टवेयर अपडेटेड है। यदि फ़ाइल खराब हो या न खुले, तो कृपया उसे पुनः डाउनलोड करें। फिर भी समस्या हो तो हमसे संपर्क करें।