इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह एक विशिष्ट और गहन दार्शनिक ग्रंथ है, जो जैन दर्शन के ‘पदार्थ विज्ञान’ के अंतर्गत ‘पुद्गल’ तत्व का विस्तृत विश्लेषण करता है। जैन दर्शन में विश्व छः द्रव्यों से बना है, जिनमें से ‘पुद्गल’ एकमात्र भौतिक या मूर्त द्रव्य है। इस पुस्तक में पुद्गल के स्वरूप, उसके भेद (अणु, स्कंध), उसके गुण, और कर्म के रूप में उसकी भूमिका का वैज्ञानिक और शास्त्रीय विवेचन किया गया है। यह जैन दर्शन के गंभीर अध्येताओं के लिए एक महत्वपूर्ण कृति है।
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