इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह एक शास्त्रार्थ और खंडन-मंडन शैली का ग्रंथ है, जो आर्य समाज या वैदिक परंपरा के दृष्टिकोण से लिखा गया है। इस पुस्तक में जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा उठाए गए 111 विशिष्ट प्रश्नों या आपत्तियों का उत्तर देने का प्रयास किया गया है। लेखक ने प्रत्येक प्रश्न का ‘युक्तियुक्त’ (तार्किक) उत्तर देने के साथ-साथ, अपने मत की पुष्टि के लिए ‘वैदिक प्रमाणों’ अर्थात् वेदों और अन्य वैदिक साहित्य से उद्धरण प्रस्तुत किए हैं। यह कृति दो भिन्न भारतीय दार्शनिक परंपराओं के बीच के सैद्धांतिक मतभेदों को दर्शाती है और इसका उद्देश्य वैदिक दृष्टिकोण की श्रेष्ठता को स्थापित करना है। यह तुलनात्मक धर्म और दर्शन के अध्येताओं के लिए एक रोचक कृति है।
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