इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“जिज्ञासा विमर्श” का अर्थ है “जिज्ञासा पर विचार-विमर्श”। यह एक दार्शनिक या बौद्धिक कृति है जो ज्ञान-प्राप्ति की मूल प्रेरणा, यानी ‘जिज्ञासा’, पर केंद्रित है। इसमें लेखक ने यह पड़ताल की होगी कि जिज्ञासा क्या है, यह क्यों उत्पन्न होती है, और कैसे सही दिशा में की गई जिज्ञासा व्यक्ति और समाज को प्रगति के पथ पर ले जाती है। पुस्तक में वैज्ञानिक खोजों, दार्शनिक चिंतन और आध्यात्मिक साधना के मूल में स्थित जिज्ञासा की भूमिका का विश्लेषण हो सकता है। यह पाठकों को प्रश्न पूछने, यथास्थिति को चुनौती देने और सत्य की निरंतर खोज करने के महत्व को समझाती है। यह ज्ञान-मीमांसा पर एक विचारोत्तेजक ग्रंथ है।
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