इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“खण्डनखण्डखाद्यम्” 12वीं सदी के महान दार्शनिक-कवि श्रीहर्ष द्वारा रचित अद्वैत वेदांत का एक शिखर ग्रंथ है। इसका शाब्दिक अर्थ है “खंडन रूपी मिठाई”। यह एक अत्यंत जटिल और गूढ़ तार्किक कृति है, जिसका मुख्य उद्देश्य न्याय-वैशेषिक दर्शन द्वारा दी गई ज्ञान-मीमांसा की सभी परिभाषाओं (जैसे- प्रमाण, प्रमेय) का अकाट्य तर्कों द्वारा ‘खंडन’ करना है। श्रीहर्ष इसमें कोई अपना सिद्धांत स्थापित नहीं करते, बल्कि वे केवल विरोधी के तर्कों में निहित अंतर्विरोधों को उजागर करते हैं। इसका अंतिम लक्ष्य यह सिद्ध करना है कि परम सत्य (ब्रह्म) तर्क और भाषा से परे है। यह भारतीय दर्शन के सबसे कठिन ग्रंथों में से एक माना जाता है।
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