इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“महापरिष्कार” न्याय-वैशेषिक दर्शन की परंपरा का एक उन्नत और गहन ग्रंथ है। ‘परिष्कार’ का अर्थ है किसी सिद्धांत को और अधिक शुद्ध, स्पष्ट और तार्किक रूप से परिमार्जित करना। यह कृति संभवतः गंगेश उपाध्याय के “तत्त्वचिंतामणि” के बाद के नव्य-न्याय के किसी सिद्धांत पर एक विस्तृत और सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसमें अनुमान, शब्द-प्रमाण या किसी अन्य ज्ञानात्मक श्रेणी की परिभाषा में मौजूद जटिलताओं को दूर करने और उसे दोष-मुक्त बनाने के लिए अत्यंत गूढ़ तार्किक भाषा का प्रयोग किया गया होगा। यह केवल न्याय-दर्शन के विशेषज्ञ विद्वानों और उच्चतर शोधकर्ताओं के लिए अभिप्रेत एक अत्यंत तकनीकी और बौद्धिक कृति है।
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