इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह पुस्तक “माण्डूक्योपनिषद्” का सार प्रस्तुत करती है, जो सबसे छोटे लेकिन सबसे महत्वपूर्ण उपनिषदों में से एक है। यह उपनिषद् केवल बारह श्लोकों में चेतना की चार अवस्थाओं – जाग्रत (वैश्वानर), स्वप्न (तैजस), सुषुप्ति (प्राज्ञ), और तुरीय (अद्वैत, शुद्ध चेतना) – का गहन विश्लेषण करता है। यह पवित्र शब्दांश ‘ॐ’ को इन चार अवस्थाओं के प्रतीक के रूप में व्याख्यायित करता है। इस सार-ग्रंथ का उद्देश्य मूल उपनिषद् के गूढ़ और संक्षिप्त संदेश को सरल भाषा में स्पष्ट करना है, ताकि पाठक अद्वैत वेदांत के इस foundational text के मर्म को समझ सकें। यह आत्मा और ब्रह्म की एकता को समझने के लिए एक शक्तिशाली मार्गदर्शिका है।
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