इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“मीमांसादर्शनम्” महर्षि जैमिनि द्वारा रचित ‘मीमांसा-सूत्र’ को संदर्भित करता है, जो भारतीय दर्शन के छह आस्तिक दर्शनों में से एक है। इसे ‘पूर्व मीमांसा’ भी कहा जाता है। इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य वेदों के कर्मकांडीय भाग की व्याख्या करना, यज्ञों की विधि को स्थापित करना और उनके फलों को सिद्ध करना है। यह वेदों को ‘अपौरुषेय’ (किसी पुरुष द्वारा रचित नहीं) और शाश्वत मानता है तथा ‘शब्द’ को ज्ञान का सर्वोच्च प्रमाण स्वीकार करता है। यह एक अत्यंत तार्किक और जटिल दर्शन है जो वैदिक वाक्यों के सही अर्थ-निर्धारण के लिए नियमों की एक विस्तृत प्रणाली विकसित करता है।
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