इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
न्यायसुधा’ शीर्षक कई ग्रंथों से जुड़ा हो सकता है, लेकिन यह संभवतः जयतीर्थ द्वारा रचित द्वैत वेदांत के एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘तत्त्वप्रकाशिका-टीका-न्यायसुधा’ को संदर्भित करता है। यह ग्रंथ मध्वाचार्य के ‘ब्रह्मसूत्र भाष्य’ पर जयतीर्थ की टीका ‘तत्त्वप्रकाशिका’ पर एक और विस्तृत उप-टीका है। ‘न्यायसुधा’ द्वैत दर्शन का एक विश्वकोशीय ग्रंथ माना जाता है, जिसमें अन्य दार्शनिक प्रणालियों, विशेषकर अद्वैत वेदांत, का खंडन करते हुए द्वैत के सिद्धांतों को तर्कपूर्ण ढंग से स्थापित किया गया है। यह द्वैत वेदांत के अध्ययन के लिए एक अनिवार्य कृति है।
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