इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह एक विद्वत्तापूर्ण शोध ग्रंथ है जो वैष्णव धर्म की पाञ्चरात्र परम्परा की संहिताओं के ‘ज्ञानपाद’ (ज्ञान से संबंधित खंड) का समीक्षात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। पाञ्चरात्र आगम ग्रंथ चार भागों में विभाजित होते हैं: ज्ञानपाद, योगपाद, क्रियापाद और चर्यापाद। यह कृति विशेष रूप से ज्ञानपाद पर ध्यान केंद्रित करती है, जिसमें तत्त्वमीमांसा, ब्रह्मांड विज्ञान, ईश्वर, जीव और मोक्ष के स्वरूप जैसे दार्शनिक विषयों का विवेचन होता है। शोधकर्ता ने संभवतः विभिन्न पाञ्चरात्र संहिताओं में प्रस्तुत ज्ञान का तुलनात्मक विश्लेषण किया है, उनके दार्शनिक विकास और सिद्धांतों की मीमांसा की है।
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