इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह एक दार्शनिक ग्रंथ है जो ज्ञान के दो प्रमुख स्रोतों (प्रमाण) – ‘प्रत्यक्ष’ (इंद्रिय अनुभव) और ‘आगम’ (शब्द या शास्त्र) – पर विस्तार से चर्चा करता है। जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, यह इन दो प्रमाणों के स्वरूप और उनकी प्रामाणिकता को लेकर ‘उल्लास’ या प्रकाश डालता है। यह कृति संभवतः न्याय, मीमांसा या वेदांत दर्शन की परंपरा में लिखी गई है, जहाँ प्रमाणों का विश्लेषण ज्ञानमीमांसा का एक केंद्रीय विषय है। इसमें यह विवेचना की गई है कि हमें इंद्रियों से प्राप्त ज्ञान पर कितना भरोसा करना चाहिए और शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान का क्या स्थान है, तथा इन दोनों के बीच क्या संबंध है।
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