इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह आचार्य अमृतचंद्र सूरि द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण जैन ग्रंथ है। इसका अर्थ है – ‘(मोक्ष रूपी) पुरुषार्थ की सिद्धि का उपाय’। इस ग्रंथ में सम्यग्दर्शन (सच्ची श्रद्धा) को मोक्ष का मूल बताते हुए एक श्रावक के आचरण और व्रतों का निश्चय और व्यवहार, दोनों नयों से सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया गया है। यह जैन गृहस्थ को यह सिखाता है कि सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए भी आत्म-कल्याण के मार्ग पर कैसे आगे बढ़ा जाए।
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