इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह एक नीतिपरक ग्रंथ है जो ‘राजभक्ति’ (राजा या राज्य के प्रति निष्ठा) को ही ‘मनुष्य का धर्म’ मानता है और इसे एक ‘दर्पण’ की तरह स्पष्ट रूप से दिखाता है। यह ब्रिटिश काल में लिखी गई हो सकती है, जिसमें प्रजा के अपने शासक के प्रति कर्तव्यों पर जोर दिया गया है। यह तर्क देती है कि एक स्थिर और न्यायपूर्ण शासन के प्रति वफादार रहना ही एक नागरिक का सर्वोच्च नैतिक कर्तव्य है, जो समाज में शांति और व्यवस्था सुनिश्चित करता है।
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