इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“रंगीला गांधी” शीर्षक वाली यह पुस्तक महात्मा गांधी के जीवन और व्यक्तित्व के उन पहलुओं पर एक आलोचनात्मक या विवादास्पद दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकती है जिन्हें आमतौर पर मुख्यधारा की चर्चाओं में नजरअंदाज कर दिया जाता है। “रंगीला” शब्द का प्रयोग व्यंग्यात्मक हो सकता है और यह गांधीजी के ब्रह्मचर्य के प्रयोगों, उनके व्यक्तिगत संबंधों, या उनके कुछ विचारों की आलोचना पर केंद्रित हो सकता है। इस तरह की कृतियाँ अक्सर स्थापित ऐतिहासिक आख्यानों को चुनौती देने का प्रयास करती हैं और एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के अधिक मानवीय, जटिल और कभी-कभी विवादास्पद पक्ष को उजागर करती हैं। यह पुस्तक गांधी के पारंपरिक ‘महात्मा’ चित्र से परे एक अलग दृष्टिकोण प्रदान करने का लक्ष्य रख सकती है।
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