इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह आचार्य कुन्दकुन्द के महान ग्रंथ ‘समयसार’ पर दिए गए प्रवचनों की विस्तृत श्रृंखला का ग्यारहवां भाग है। ‘समयसार’ आत्मा के शुद्ध स्वरूप का वर्णन करने वाला जैन दर्शन का सर्वोच्च ग्रंथ है। श्री मनोहर जी वर्णी ‘सहजानंद’ के यह प्रवचन इस गूढ़ ग्रंथ की गाथाओं को सरल और सुबोध भाषा में समझाते हैं, ताकि आम साधक भी आत्म-ज्ञान और भेद-विज्ञान के मार्ग को समझ सकें। यह श्रृंखला स्वाध्याय करने वालों के लिए एक अनमोल खजाना है।
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