इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह एक अत्यंत गूढ़ और विचारोत्तेजक पुस्तक है जो एक संत और एक गणिका (वेश्या) के बीच हुए संवाद को प्रस्तुत करती है। इस संवाद का केंद्रीय विषय ‘कामाध्यात्म दर्शन’ है, अर्थात् काम (desire/lust) और अध्यात्म के बीच का संबंध। यह कृति इस प्रश्न की पड़ताल करती है कि क्या काम केवल एक शारीरिक वृत्ति है या इसका कोई आध्यात्मिक आयाम भी है। इसमें तांत्रिक और सहजयानी परंपराओं के विचार हो सकते हैं, जो काम-ऊर्जा के दमन के बजाय उसके रूपांतरण पर बल देते हैं। यह एक साहसिक और अपरंपरागत दार्शनिक कृति है, जो नैतिकता, शरीर और आत्मा के संबंधों पर एक नए दृष्टिकोण से सोचने के लिए मजबूर करती है।
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