इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“सत्यार्थ प्रकाश” आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 19वीं शताब्दी में रचित एक क्रांतिकारी और युगांतकारी ग्रंथ है। इस पुस्तक में स्वामी जी ने वेदों को सच्चा और अंतिम ज्ञान का स्रोत मानते हुए, तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त पाखंड, अंधविश्वास, मूर्तिपूजा, बाल-विवाह और जाति-पाति जैसी कुरीतियों पर जोरदार प्रहार किया है। उन्होंने विभिन्न मत-पंथों की मान्यताओं की तर्कपूर्ण समीक्षा की है और वैदिक एकेश्वरवाद को पुनः स्थापित करने का आह्वान किया है। यह ग्रंथ केवल एक धार्मिक कृति नहीं, बल्कि एक सामाजिक और राष्ट्रीय जागरण का घोषणापत्र है, जिसने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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