इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“शास्त्रवार्त्तासमुच्चय” जैन दार्शनिक आचार्य हरिभद्र सूरि द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसका अर्थ है “विभिन्न शास्त्रीय विचारों की चर्चा का संग्रह”। इस कृति में, आचार्य हरिभद्र ने भारतीय दर्शन के विभिन्न स्कूलों – जैसे न्याय, वैशेषिक, सांख्य, बौद्ध, और चार्वाक – के मूल सिद्धांतों की निष्पक्ष और संक्षिप्त प्रस्तुति की है। उन्होंने प्रत्येक दर्शन के प्रमुख तर्कों को प्रस्तुत करने के बाद, जैन दृष्टिकोण से उनकी समीक्षा की है। यह ग्रंथ भारतीय दर्शन के एक तुलनात्मक अध्ययन का एक प्रारंभिक और उत्कृष्ट उदाहरण है, जो उस युग की बौद्धिक उदारता और संवाद की परंपरा को दर्शाता है।
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