इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“श्रीभक्तमाल” नाभादास जी द्वारा रचित एक कालजयी ग्रंथ है, जिसमें मध्यकालीन भारत के लगभग दो सौ भक्तों के संक्षिप्त और सारगर्भित चरित्रों का वर्णन है। यह पुस्तक उस मूल ग्रंथ का ‘मूलार्थबोधिनी’ नामक टीका (commentary) के साथ प्रस्तुत संस्करण है। टीका का उद्देश्य मूल ‘छप्पय’ छंदों में लिखे गए संक्षिप्त चरित्रों के अर्थ को खोलना, उनके प्रसंगों को विस्तार देना और छिपे हुए भावों को स्पष्ट करना है। यह संस्करण पाठकों को न केवल भक्तों के जीवन की घटनाओं से परिचित कराता है, बल्कि उनके भक्ति-सिद्धांतों और आध्यात्मिक महत्व को भी गहराई से समझने में मदद करता है। यह वैष्णव भक्ति परंपरा का एक विश्वकोश और साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
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