इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“त्रैतसिद्धान्तादर्शः” या “त्रैत सिद्धांत विमर्श” एक दार्शनिक कृति है जो ‘त्रैतवाद’ के सिद्धांत का विश्लेषण करती है। त्रैतवाद एक दार्शनिक स्थिति है जो मानती है कि वास्तविकता तीन अलग-अलग और irreducible substances से बनी है। हिंदू दर्शन के संदर्भ में, यह मध्वाचार्य के ‘द्वैतवाद’ (जो ईश्वर और आत्मा को अलग मानता है) से भिन्न हो सकता है और संभवतः ईश्वर, आत्मा (जीव) और प्रकृति (जगत) को तीन स्वतंत्र और शाश्वत सत्ताओं के रूप में प्रस्तुत करता है। यह पुस्तक इस विशिष्ट दार्शनिक सिद्धांत की स्थापना करती है, इसके पक्ष में तर्क प्रस्तुत करती है, और अद्वैतवाद तथा द्वैतवाद जैसे अन्य सिद्धांतों के साथ इसकी तुलना और आलोचना करती है।
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