इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“सांख्य कारिका” ईश्वरकृष्ण द्वारा रचित, सांख्य दर्शन का सबसे प्रामाणिक और आधारभूत ग्रंथ है। यह भारतीय दर्शन के सबसे प्राचीन स्कूलों में से एक के सिद्धांतों को मात्र 72 संक्षिप्त और सारगर्भित ‘कारिकाओं’ (श्लोकों) में प्रस्तुत करता है। इस ग्रंथ में सृष्टि की रचना का विश्लेषण ‘पुरुष’ (चेतना) और ‘प्रकृति’ (पदार्थ) के द्वैतवादी सिद्धांत के आधार पर किया गया है। यह विस्तार से बताता है कि कैसे प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्) के सामंजस्य से बुद्धि, अहंकार और मन सहित 25 तत्वों का विकास होता है। योग, वेदांत और गीता पर इसके गहरे प्रभाव के कारण यह भारतीय दर्शन को समझने के लिए एक अनिवार्य कृति है।
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