इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह एक ‘स्मारिका’ (souvenir magazine) है जो 15वीं-16वीं सदी के महान भक्ति-संत, श्री चैतन्य महाप्रभु (जिन्हें ‘श्री गौरांग’ भी कहा जाता है), को समर्पित है। स्मारिकाएँ आमतौर पर किसी विशेष अवसर, जैसे- किसी जयंती या उत्सव, पर प्रकाशित की जाती हैं। इसमें श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन, उनकी शिक्षाओं (अचिन्त्य भेदाभेद सिद्धांत), और उनके द्वारा लोकप्रिय बनाए गए ‘संकीर्तन आंदोलन’ पर विभिन्न विद्वानों और भक्तों के लेख, कविताएँ और संस्मरण शामिल होंगे। इसमें गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के इतिहास और उसके प्रमुख आचार्यों पर भी सामग्री हो सकती है। यह चैतन्य महाप्रभु के अनुयायियों के लिए एक संग्रहणीय और भक्तिपूर्ण प्रकाशन है।
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