इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह कृति संस्कृत व्याकरण के विशाल और समृद्ध इतिहास पर लिखे गए एक विस्तृत ग्रंथ का दूसरा भाग है। यह पुस्तक पाणिनि के बाद की व्याकरणिक परंपरा के विकास का पता लगाती है। इस खंड में संभवतः कात्यायन (वार्तिककार) और पतंजलि (महाभाष्यकार) जैसे महान वैयाकरणों के योगदान की विस्तृत विवेचना की गई है, जिन्होंने पाणिनि के सूत्रों की व्याख्या, पूरक और स्थापना की। इसके बाद, इसमें “काशिकावृत्ति” और बाद के व्याकरणिक स्कूलों जैसे- सारस्वत, जैनेन्द्र, और बोपदेव के विकास पर भी चर्चा हो सकती है। यह ग्रंथ संस्कृत व्याकरण के ऐतिहासिक विकास और उसकी विभिन्न शाखाओं को समझने के लिए शोधकर्ताओं और भाषाविदों के लिए एक अनिवार्य संदर्भ स्रोत है।
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