इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह पुस्तक गौड़ीय वैष्णव दर्शन के तीन मौलिक सिद्धांतों – संबंध, अभिधेय, और प्रयोजन – के संदर्भ में “शुद्ध भक्ति” की अवधारणा का गहन विश्लेषण करती है। ‘संबंध’ का अर्थ है जीव, जगत और ईश्वर के बीच के वास्तविक संबंध का ज्ञान। ‘अभिधेय’ वह साधन या प्रक्रिया है (मुख्य रूप से भक्ति-योग) जिसके द्वारा उस संबंध को पुनः जागृत किया जाता है। ‘प्रयोजन’ उस साधना का अंतिम लक्ष्य है, जो है कृष्ण-प्रेम की प्राप्ति। यह कृति इन तीन चरणों के माध्यम से समझाती है कि शुद्ध भक्ति क्या है और इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है। यह गौड़ीय वैष्णव दर्शन के गंभीर छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक ग्रंथ है।
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