इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“अथात्मपूजा” एक दार्शनिक और आध्यात्मिक ग्रंथ है जो ‘आत्म-पूजा’ की अवधारणा पर केंद्रित है। इसका मूल विचार यह है कि सच्ची पूजा किसी बाहरी देवता की नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित दिव्य आत्मा की ही होनी चाहिए। यह अद्वैत वेदांत के सिद्धांत “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ब्रह्म हूँ) पर आधारित है। इस पुस्तक में यह समझाया गया है कि कैसे हम अपने शरीर को मंदिर, अपनी इंद्रियों को सेवक, और अपने सभी कार्यों को आत्मा-रूपी ईश्वर की पूजा मानकर जीवन जी सकते हैं। यह बाहरी कर्मकांडों से परे जाकर, आत्म-ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से की जाने वाली आंतरिक उपासना का मार्ग दिखाती है।
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