इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति’ की ‘प्रवाहमान’ और निरंतर प्रकृति पर एक गहन विवेचन प्रस्तुत करती है। यह तर्क देती है कि भारतीय संस्कृति कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि एक जीवंत नदी की तरह है, जिसने हजारों वर्षों में अनेक सहायक नदियों (विभिन्न प्रभावों) को आत्मसात किया है और फिर भी अपनी मूल धारा को बनाए रखा है। यह कृति भारतीय संस्कृति की निरंतरता, उसकी अनुकूलनशीलता और ‘अनेकता में एकता’ के अद्भुत चरित्र का विश्लेषण करती है।
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