इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता के केवल ‘प्रथम अध्याय’, ‘अर्जुनविषादयोग’, पर एक विस्तृत टीका या विवेचन है। इसमें अर्जुन के उस विषाद और मोह की गहरी मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक व्याख्या की गई है, जो उसे युद्ध से विमुख कर रहा था। यह अध्याय गीता के पूरे उपदेश की पृष्ठभूमि तैयार करता है, और यह पुस्तक उसी आधारशिला के हर पहलू का गहन विश्लेषण करती है, जो आध्यात्मिक यात्रा के पहले कदम को दर्शाता है।
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