इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा मांडले जेल में लिखा गया श्रीमद्भगवद्गीता पर एक कालजयी और क्रांतिकारी भाष्य है। इसमें तिलक ने गीता की पारंपरिक संन्यास-मार्गी व्याख्याओं से अलग, ‘कर्मयोग’ को ही गीता का मुख्य संदेश सिद्ध किया है। उन्होंने तर्क दिया कि गीता हमें कर्मों का त्याग करने के लिए नहीं, बल्कि अनासक्त भाव से लोक-कल्याण के लिए कर्म करने का उपदेश देती है। यह ग्रंथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों के लिए एक प्रमुख प्रेरणा स्रोत बना।
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