इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
कर्मविपाक’, जिसे ‘प्रथम कर्मग्रंथ’ भी कहा जाता है, जैन कर्म सिद्धांत पर एक मौलिक ग्रंथ है। ‘कर्मविपाक’ का अर्थ है कर्मों का फल या परिणाम। यह ग्रंथ विस्तार से बताता है कि हमारे द्वारा किए गए अच्छे और बुरे कर्म किस प्रकार अलग-अलग फल देते हैं और हमारे जीवन की परिस्थितियों, सुख-दुःख और भविष्य की गतियों को निर्धारित करते हैं। यह पहला कर्मग्रंथ होने के नाते, कर्मों की मूल प्रकृतियों और उनके बंधने तथा फल देने की प्रक्रिया की आधारभूत समझ प्रदान करता है, जो जैन दर्शन की नींव है।
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