इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
“लक्षणावली” न्याय-वैशेषिक या किसी अन्य भारतीय दर्शन से संबंधित एक ग्रंथ है, जिसका अर्थ है “परिभाषाओं की सूची”। इस प्रकार के ग्रंथों में उस दर्शन के प्रमुख पारिभाषिक शब्दों या अवधारणाओं की सटीक और तार्किक ‘लक्षण’ (परिभाषा) दी जाती है। उदाहरण के लिए, न्याय दर्शन में ‘प्रमाण’, ‘प्रमेय’, ‘संशय’ आदि के लक्षण दिए जाएंगे। एक अच्छी परिभाषा (लक्षण) वह मानी जाती है जिसमें ‘अव्याप्ति’ और ‘अतिव्याप्ति’ दोष न हों। यह पुस्तक उस दर्शन के पारिभाषिक ढांचे को समझने के लिए एक बुनियादी और अनिवार्य उपकरण है, जो छात्रों को विषय की स्पष्ट और सटीक समझ प्रदान करती है।
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