इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह आचार्य कुन्दकुन्द के महान ग्रंथ ‘नियमसार’ पर दिए गए विस्तृत प्रवचनों की श्रृंखला का पाँचवाँ भाग है। ‘नियमसार’ आत्मा के शुद्ध स्वरूप का वर्णन करने वाला जैन दर्शन का सर्वोच्च ग्रंथ है। ये प्रवचन इस गूढ़ ग्रंथ की गाथाओं को सरल और सुबोध भाषा में समझाते हैं, ताकि आम साधक भी आत्म-ज्ञान और भेद-विज्ञान के मार्ग को समझ सकें और अपने जीवन में उतार सकें। यह श्रृंखला स्वाध्याय करने वालों के लिए एक अनमोल खजाना है।
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