इस पुस्तक के विषय
पुस्तक विवरण
यह जैन अध्यात्म के शिखर ग्रंथ, आचार्य कुन्दकुन्द के ‘समयसार’ पर आचार्य अमृतचन्द्र द्वारा लिखे गए ‘आत्मख्याति’ टीका के अंत में दिए गए काव्यमयी ‘कलश’ श्लोकों पर एक और टीका या विस्तृत व्याख्या है। ये ‘कलश’ पूरे ग्रंथ के सार को सुंदर छंदों में प्रस्तुत करते हैं। यह टीका उन गहन और काव्यात्मक श्लोकों के अर्थ को खोलती है, और साधकों को ‘समयसार’ के शुद्ध आत्म-तत्व के अनुभव की ओर ले जाने में मदद करती है। यह जैन अध्यात्म का एक गहरा अध्ययन है।
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