इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
सांख्य दर्शनम्’ भारतीय दर्शन के छह आस्तिक दर्शनों में से एक, सांख्य दर्शन का मूल ग्रंथ है, जिसके प्रणेता महर्षि कपिल माने जाते हैं। यह दर्शन सृष्टि की व्याख्या दो मूल तत्त्वों—पुरुष (चेतना) और प्रकृति (पदार्थ)—के आधार पर करता है। इसके अनुसार, पुरुष अनेक, निष्क्रिय और ज्ञाता है, जबकि प्रकृति एक, सक्रिय और जड़ है। इन दोनों के संयोग से ही सृष्टि का विकास होता है। मोक्ष का मार्ग पुरुष द्वारा स्वयं को प्रकृति से भिन्न समझने (विवेक-ज्ञान) में निहित है। सांख्य दर्शन का प्रभाव योग, वेदांत और आयुर्वेद सहित कई अन्य भारतीय परंपराओं पर गहरा रहा है।
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