इस पुस्तक के विषय
पुस्तक सार
यह पुस्तक चैतन्य महाप्रभु (श्री गौर) के प्रमुख पार्षदों (साथियों) और गौड़ीय वैष्णव परंपरा के बाद के महत्वपूर्ण आचार्यों की संक्षिप्त जीवनियों का दूसरा खंड है। “चरितामृत” का अर्थ है ‘जीवन का अमृतमय वृत्तांत’। इस कृति में इन महान वैष्णव संतों के जीवन, उनकी शिक्षाओं, उनके भक्तिपूर्ण कार्यों और गौड़ीय वैष्णव दर्शन के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान का वर्णन किया गया है। यह खंड संभवतः नित्यानंद प्रभु, अद्वैत आचार्य के बाद के प्रमुख भक्तों या षड्गोस्वामियों के अनुयायियों के जीवन पर केंद्रित हो सकता है। यह गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के इतिहास और उसकी गुरु-परंपरा को समझने के लिए भक्तों और शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
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